Monday, October 7, 2013
नए ‘महिषासुर’ हैं बलात्कार
कोलकाता। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के बढ़ते मामलों ने दुर्गा पूजा के आयोजकों को इस बार पंडालों में महिला सशक्तीकरण की अवधारणा का प्रस्तुतीकरण करने के लिए प्रेरित किया है। पंडालों में बलात्कारियों को महिषासुर के रूप में पेश किया जा रहा है। महिषासुर नामक राक्षस का देवी द्वारा संहार किया जाता है।
आयोजकों ने कहा कि हम दिखाना चाहते हैं कि पौराणिक युग की बुरी शक्तियां या राक्षस आज की महिलाओं को तकलीफ देने के लिए बलात्कारियों के रूप में लौटकर आए हैं। ये पुरुष ा आज के महिषासुर हैं।
सॉल्ट लेक इलाके में सामुदायिक पूजा के आयोजकों ने देवी दुर्गा के 11 विभिन्न स्वरूप बनाए हैं, जिनमें से 10 स्वरूपों में वह बलात्कारियों के रूप में दिखाए गए उन राक्षसों का संहार कर रही हैं, जो महिलाओं की अस्मिता से खिलवाड़ कर रहे हैं।
एफडी ब्लॉक पूजा समिति के अध्यक्ष प्रदीप सेनगुप्ता ने बताया कि हमारी थीम विश्व में हर जगह से बलात्कारियों को समाप्त करने पर आधारित है। मां दुर्गा को बुरी शक्तियों के विनाश के लिए जाना जाता है और आज बलात्कारी उन सबसे बड़ी बुराईयों में से एक हंै जो कि हमारे समाज को कष्ट पहुंचा रहे हैं। एक राक्षस को एक ऐसे पुरुष के रूप में दिखाया गया है, जिसने एक सूट पहन रखा है और वह एक महिला को घूर रहा है। इस आदमी का चेहरा राक्षस का है और दुर्गा को उसपर ‘त्रिशूल’ से वार करते हुए दिखाया गया है।
सेनगुप्ता ने कहा कि प्रतीकों के माध्यम से हम यह दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं कि दुर्भाग्यवश बलात्कार सभी तरह की जगहों पर होते हैं। हमारी महिलाएं प्रताड़ित हो रही हैं और अब समाज के अच्छे लोगों को उठना चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए।
भवानीपुर में एक अन्य प्रसिद्ध पूजा आयोजक ने महिलाओं के सम्मान की सुरक्षा की जरूरत को दर्शाने के लिए 250 किलोग्राम धागे से 5 किलोमीटर लंबी हैंडलूम की साड़ी बनाई है। भवानीपुर 75 पल्ली सर्बजनीन दुर्गोत्सव समिति के सचिव सुबीर दास ने कहा कि जब भी हम असुरक्षित महसूस करते हैं तो अपनी मां के ‘आंचल’ में शरण लेना चाहते हैं, फिर चाहे हमारी उम्र कुछ भी हो। लेकिन अब माताआें और बहनों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ जाने की वजह से वे खतरे में हैं। इस 5 किलोमीटर लंबी साड़ी में हम महिलाओं के सशक्तीकरण की जरूरत की बात कर रहे हैं।
भवानीपुर पूजा के लिए पंडाल तैयार करने में कलाकार सोमनाथ मुखोपाध्याय को तीन माह का समय लगा। सोमनाथ कहते हैं कि आंचल एक महिला की आबरू और सुरक्षा का प्रतीक है। -एजेंसी। bhasa
Saturday, October 5, 2013
छत्तीसगढ़ में विकास बनाम भ्रष्टाचार पर जंग
विधानसभा चुनाव :
संजय स्वदेश/रायपुर
देश की राजधानी दिल्ली में जैसे ही चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव की घोषणा की, छत्तीसगढ़ की की राजधानी रायपुर की सियासी गलियारे में हलचल बढ़ गई। आचार संहिता को लागू करने के लिए प्रशासन पहले से मुस्तैद बैठा था। सड़कों के किनारे चमकते दमकते आकर्षक पोस्टर फटने लगे। सरकार व मंत्रियों से संबंधित होर्डिंग उतरने लगे। सरकारी गैरेज में मंत्रियों की गाड़ियां पहुंचे लगी। मंत्रियों का रूतबा उतर गया। शहर नेताओं से आजाद हो गया।
छोटे से राज्य के दो बड़े दल भाजपा और कांग्रेस खुल कर मैदान में उतर गए। उनके तरकश से मुद्दे के तीर छूटने लगे। दशक भर से राज्य की सत्ता से महरूम कांग्रेस ने हुंकार भरी। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश के कद्दवार कांग्रेस रविंद्र चौबे ने ललकारते हुए कहा कि चुनावी मैदान में उतरने तैयार हैं। भाजपा सरकार का भ्रष्टाचार और वादाखिलाफी जैसे कई मुद्दों पर आक्रोशित जनता सरकार को उखाड़ फेंकने तैयार है। आचार संहिता प्रभावी होने के साथ इस सरकार के ताबूत में अंतिम कील ठुक चुका है।
अक्सर मौन और सौम्य दिखने वाले चाउर वाले बाबा डा. रमन सिंह भी मुखर हो गए। आचार संहिता लागू होते ही पहली प्रतिक्रिया दी- हम तो तैयार ही बैठे हैं। विकास के मुद्दे के साथ यह चुनाव लड़ा जाएगा। जनता के बीच सरकार अपनी उपलब्धियों को लेकर जाएगी। कांग्रेस के पास कोई मुद्दा नहीं है। विकास यात्रा में जनता का जो उत्साह छलका, उसके बेहतर परिणाम नजर आएंगे। भाजपा सरकार ने अपने वादे के अलावा अतिरिक्त कार्य भी किए हैं। इसका भी फायदा मिलेगा। डा. रमन के मुताबिक छत्तीसगढ़ में इस बार 5 से 7 फीसदी अधिक वोट पड़ेंगे। बीते चुनाव की तुलना में इस बार भाजपा की अधिक सीटें जीतकर आएगी। इसके साथ ही मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे राजनांदगांव से ही चुनाव लड़ेंगे। बीच में यह चर्चा सुर्खियों में थी कि डा. रमन सिंह अपना चुनावी मैदान बदल सकते हैं या फिर दो जगह से मैदान में उतर सकते हैँ।
विकास बनाम भ्रष्टाचार
मतलब साफ है, निर्वतमान सरकार के मुखिया डा. रमन सिंह अपने विकास कार्यों का हिसाब किताब छत्तीसगढ़ की जनता को बताएंगे और फिर से सत्ता का मौका पाएंगे। रमन के विकास में भ्रष्टाचार देखने वाली कांग्रेस भ्रष्टचार के मुद्दे को ही जनता में भुनाने की आस में बैठी है। फिलहाल कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी की ऊंट किस करवट बैठेगा यह ठोस कुछ कहा नहीं जा सकता है। पूरे के पूरे चुनावी समीकरण इसी पर निर्भर है। हालांकि तीसरे मोर्चे को लेकर जो चर्चाएं थी, उसका असर कुछ खास पड़े ऐसी कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है। तीसरे मोर्चे का असर स्थानीय स्तर पर उम्मीदवारों के अनुसार भाजपा और कांग्रेस के वोटों पर असर करेगा। पर लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहेगी।
तू डाल-डाल मैं पात पात
चुनाव में मुद्दे को लेकर कांग्रेस ओर भाजपा के बीच तू डाल डाल मैं पात पात की स्थिति की संभावना बनती दिख रही है। चुनाव की घोषणा होने से से पहले ही भाजपा और विपक्ष कांग्रेस ने अपनी रणनीतियों को मूर्त रूप देना शुरू कर दिया था। भाजपा के चाणक्यों को रमन सरकार के दस वर्ष के कार्यकाल एवं विकास के मुद्दों का ही ब्रहत्र है। वहीं कांग्रेस रमन सरकार के भ्रष्टाचार को लेकर जनता दरबार में जमेगी। लिहाजा, भाजपा के धुरंधरों को विकास के दांव के साथ कांग्रेस के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जवाब देना थोड़ा मुश्किल कर सकता है। भ्रष्टाचार सहित जीरम घाटी नक्सल हादसा समेत नक्सली हिंसा में मारे गए आदिवासियों का मुद्दे कांग्रेस के तरकस के कुछ ऐसे तीर हैं जो भाजपा को निरूत्तर कर सकते हैं।
इन मुद्दों को भुनाएगी भाजपा
-दस वर्ष में छत्तीसगढ़ का विकास
-उपलब्धियां और योजनाओं का ब्योरा
-खाद्यान्न सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली
-विभिन्न वर्गों को सौगातें
-इस कुशासन को गिनाएगी कांग्रेस
- दस वर्ष के कुशासन और भ्रष्टाचार
- जीरम नक्सल हादसे में चूक
- नक्सली हिंसा और लचर कानून व्यवस्था
- सरकार की वादाखिलाफी
- प्रशासनिक आतंकवाद
- मंत्रियों की खींचतान
- घोटालेबाजों को संरक्षण
- किसानों की आत्महत्या
- आदिवासियों और दलितों पर अत्याचार
- कांकेर के कन्या आश्रम में सरकारी संरक्षण में दुष्कर्म
Friday, June 7, 2013
पैदल ही डाक बांटती हैं 'रानी'
नागपुर। 6 जून
23 साल से शहर में महत्वपूर्ण डाक बांटने वाली जीपीओ की पहली महिला पोस्ट वूमेन रानी हीरामंडल पैदल ही डाक बांटने का काम करती हैं. उनके कार्यक्षेत्र में अधिकांश बडे. सरकारी कार्यालय आते हैं. पैदल चलने के बावजूद वे शत प्रतिशत डाक बांटने में सफल रही हैं. यही वजह है कि 4 जून को डाक विभाग ने उन्हें सम्मानित किया है. उनके पति मोरेश्वर हीरामंडल वायुसेना नगर में सब पोस्ट मास्टर हैं लेकिन, दोनों के बीच काम को लेकर कभी कोई शिकवा नहीं रहा.जीपीओ की पोस्ट वूमेन रानी मोरेश्वर हीरामंडल 1991 में पिता की मौत के बाद अनुकंपा आधार पर इस पद पर नियुक्त हुईं. 1998 में उनकी शादी हुई. उनका एक 14 साल का बेटा है. o्रीमती रानी परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए सुबह 8 बजे से शाम 5.30 बजे तक पैदल चलकर डाक बांटने का काम करती हैं .उन्होंने बताया कि उनका मायका व ससुराल भी नागपुर का ही है. नौकरी के साथ उन्हें ससुराल के अलावा मायके की भी जिम्मेदारी संभालनी पड.ती है. काम की थकान बहुत रहती है लेकिन, मैं खुशनसीब हूं कि पति व पुत्र के अलावा डाक विभाग व अन्य विभागों के अधिकारियों का प्रोत्साहन भी मिलता है.पैदल चलने का सबसे बड.ा फायदा ये है कि मुझे कभी कोई बड.ी बीमारी नहीं हुई. प्रतिदिन 1000 से 1500 डाक बांटती हूं. मैं तो केवल काम करते चली गई लेकिन विभाग ने शत प्रतिशत डाक बांटने पर 4 जून को मुझे पुरस्कृत किया है( from lokmat samachar.nagpur
Thursday, June 6, 2013
बहन ने की लव मैरेज, भाई ने किया जीजा का मर्डर
नई दिल्ली।। साउथ वेस्ट दिल्ली के पालम क्षेत्र के मंगलापुरी इलाके में बुधवार रात एक युवक आकाश ने अपने ही जीजा सुरेश की चाकू से गोद कर हत्या कर दी और फरार हो गया।
मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने छानबीन कर मृतक की बॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल भेज दिया। मृतक का नाम सुरेश (25) है, जो पालम के मंगोलपुरी फेज-2 में रहता था। सुरेश की गलती यही थी कि उसने करीब डेढ़ साल पहले मोनिका नाम की लड़की से लव मैरेज की थी। इस बात को लेकर मोनिका का भाई आकाश (22) नाराज था। कई बार धमकी भी दे चुका था कि वह सुरेश को मार डालेगा।
मोनिका ने बताया कि उसके भाई ने उसके पति को मार दिया और भाग गया। भाई इसलिए नाराज था कि उसने दूसरी बिरादरी के लड़के सुरेश से अपनी पसंद से शादी की थी। मोनिका का कहना है कि आकाश ने पहले भी मुझसे कहा था कि मैं उसे मार डालूंगा। इस शादी को लेकर घर वाले पहले तैयार नहीं थे, लेकिन बाद में पापा को मंजूर हो गया था। मेरा भाई राजी नहीं था। अभी तक आरोपी आकाश पुलिस की गिरफ्त में नहीं आया है। -नवीन निश्चल// नवभारत टाइम्स | Jun 6, 2013
रेप पीड़िता के गर्भ में 8 माह का बच्चा, कोर्ट से मांगी मदद
नई दिल्ली|
दुष्कर्म की शिकार होने के बाद से घरवालों ने 19 वर्षीय रेप पीड़िता को उसे अपने हाल पर छोड़ दिया है। पेट में पल रहे आठ माह के बच्चे को जन्म देने और अपने बेहतर स्वास्थ्य के लिए उसने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
रेप पीड़िता ने कोर्ट में दायर याचिका में अपने बच्चे को जन्म देने के लिए सरकार से मेडिकल और वित्तीय मदद की मांग की है। साथ ही उसने कहा है कि बालिग होने तक सरकार उसके बेटे की देखभाल करे। उसने कहा है कि वह एक बहुत ही गरीब परिवार से है। गरीबी के कारण ही उसके घरवालों ने उसे ठुकरा दिया है। वह उसके इलाज का खर्च नहीं उठा सकते हैं। कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को इस मामले में जबाव देने का निर्देश्ा दिया है।
पीड़िता के वकील ने बताया कि सामाजिक कलंक के कारण ही उसके घरवालों ने उसे छोड़ दिया है। पीड़िता की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है और वह बच्चे को जन्म देने में लगने वाला खर्च नहीं उठा सकती है।
वह फिलहाल अपने दूर के एक रिश्तेदार के यहां रह रही है।
वकील ने बताया कि उसने अपना गर्भपात कराने के लिए कोर्ट में याचिका दी थी लेकिन बाद डॉक्टरों ने इससे इनकार कर दिया।
गौरतलब है कि अक्टूबर 2012 में एक पड़ोसी ने उससे रेप किया था। उसने यह बात किसी से बताने पर भाई की हत्या करने की धमकी दी थी। आरोपी अभी भी फरार है। from amar ujala
पीड़िता के वकील ने बताया कि सामाजिक कलंक के कारण ही उसके घरवालों ने उसे छोड़ दिया है। पीड़िता की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है और वह बच्चे को जन्म देने में लगने वाला खर्च नहीं उठा सकती है।
वह फिलहाल अपने दूर के एक रिश्तेदार के यहां रह रही है।
वकील ने बताया कि उसने अपना गर्भपात कराने के लिए कोर्ट में याचिका दी थी लेकिन बाद डॉक्टरों ने इससे इनकार कर दिया।
गौरतलब है कि अक्टूबर 2012 में एक पड़ोसी ने उससे रेप किया था। उसने यह बात किसी से बताने पर भाई की हत्या करने की धमकी दी थी। आरोपी अभी भी फरार है। from amar ujala
कहां गुम हो जाती हैं टॉपर बेटियां?
Thursday, March 28, 2013
देह शोषण को लाल सलाम
कभी सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ युद्ध के नाम पर शुरू हुआ नक्सली आंदोलन अपने ही संगठन में नारी देह के भंवर में फंस गया है। सामंतों के महिलाओं पर यौन उत्पीड़न की जो घटनाएं पहले सुनी जाती थी, आज वैसा ही कुछ नक्सली संगठन में शामिल महिलाओं के साथ हो रहा है। वे अपने ही साथियों की हवस का शिकार हो रही है। या यूं कहें तो नक्सली आंदोलन के कार्यकर्ता हवस की आग में जल कर न केवल अपने ही महिला साथियों से जबरदस्ती सेक्स की भूख मिटा रहे है। बल्कि आदिवासी इलाकों के लड़कियों का भी जबरन देह शोषण कर रहे हैं। महिलाएं मजबूर है, न विरोध कर पाती हैं और न हीं संगठन छोड़ समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की हिम्मत जुटा पा रही है।----- आदिवासी बच्चियों का यौन शोषण कर रहे नक्सली सुरक्षाकर्मियों को फांसने के लिए किया स्वीट-प्वाइजन का गठन संजय स्वदेश छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले की पुलिस ने मद्देड़ थाना क्षेत्र में 11 और 12 वर्ष की दो ऐसी नाबालिग लड़कियों का मामला दर्ज किया, जिसकी अस्मत के साथ नक्सलियों ने खिलवाड़ किया। दोनों लड़कियों ने नक्सली सदस्य कुड़ियम गुज्जा, नागेश और शिवाजी पर शारीरिक शोषण करने का आरोप लगाया है। ये लड़कियों पुलिस को तब हाथ लगी जब जिला पुलिस बल और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) का सयुंक्त दल मद्देड़ क्षेत्र में गस्त और खोजी अभियान के लिए रवाना हुआ था। क्षेत्र में गांव से लगे जंगल में पुलिस दल को ये दो नाबालिक लड़कियां मिली। पुलिस द्वारा पूछताछ पर लड़कियों ने बताया कि नक्सली मुड़ियम गुज्जा और उसके साथी उन्हें जबरदस्ती अपने साथ ले गये थे तथा जंगल में कुड़ियम गुज्जा, नागेश और शिवाजी ने जबरन उनकी आबरु को तार-तार किया। दोनों लड़कियों ने यह भी खुलासा किया कि उनके देह शोषण का सिलसिला काफी समय से चल रहा था। नक्सली उन्हें गांव आकर ले जाते हैं। उनसे काम करवाते है तथा डरा-धमका कर जबरन शारीरिक संबंध बनाते हैं। परिवार वालों के द्वारा मना करने पर उन्हें जान से मार डालने अथवा गांव से निकाल देने की धमकैी देते हैं। लड़कियों ने बताया कि वे अपने गांव वापस नहीं जाना चाहती हैं तथा वे कभी स्कूल नहीं गई है अब आश्रम में रहकर पढ़ना चाहती है। जिला के पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवावल कहते हैं कि लड़कियों द्वारा इसकी जानकारी देने के बाद पुलिस दल ने उन्हें सुरक्षित बीजापुर पहुंचाया तथा उनकी रिपोर्ट पर दो नवंबर को नक्सलियोंं के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। दोनों लड़कियों की मेडिकल जांच में उनके शारीरिक शोषण किए जाने की पुष्टि हुई। जिला पुलिस अधीक्षक ने बताया कि पूछताछ के दौरान लड़कियोंं ने जानकारी दी है कि उनके जैसी और भी कई लड़कियां हैं जिन्हें गांव से नक्सली अगवा कर अपने साथ ले जाते हैं तथा उनका शारीरिक शोषण करते हैं। लड़कियोंं के माता पिता द्वारा इसका विरोध किये जाने पर उन्हें गांव से बाहर निकाल देने की धमकी देते हैं। नक्सलियों ने गांव वालों को लड़कियों को पढ़ाने के लिए मना किया हुआ है। फिलहाल पुलिस ने दोनों लड़कियों के पुर्नवास और शिक्षा के लिए समुचित व्यवस्था कर रही है। मासूम लड़कियों के यौन शोषण की यह हकीकत तब सामने आई जब पुलिस ने उन्हें पकड़ा। छत्तीसगढ़ के नक्सली इलाकों की हकीकत यह है कि नक्सल इलाकों में आदिवासियों की बेटियां नहीं पढ़ पा रहीं। घरों में कैद इन नन्ही जानों पर नक्सलियों का कहर बरप रहा है। नक्सली न केवल इनका यौन शोषण कर रहे हैं बल्कि इन लड़कियों का इस्तेमाल नक्सली क्षेत्र में तैनात सुरक्षाकर्मियों को फंसाने के लिए भी प्रशिक्षित कर रहे हैं। केंद्रीय गृहमंत्रालय को मिली सूचना के अनुसार नक्सली 12 से 16 साल की लड़कियों का इस्तेमाल जहां सुरक्षाकर्मियोंं को फंसाने के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं वहीं नक्सली नेता इनका यौन शोषण भी कर रहे हैं। लड़कियों को नहीं भेजने वाले परिवार को जान से मारने की धमकी जा रही है। यही कारण है कि नक्सली बारी-बारी से अपनी भर्तियों में लड़कों के अलावा बाल-संघम में लड़कियों को भी सशस्त्र प्रशिक्षण दे रहे हैं। गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार गोंडी भाषा में मिले कुछ कागजातों के हवाले से मिली जानकारी में यह साफ है कि नक्सलियों ने कुछ लड़कियों को खास तरह से प्रशिक्षित किया है ताकि समय पर वे सुरक्षाकर्मियों को उनके ही जाल में फंसा सकें। गरीब आदिवासी लड़कियों के यौन शोषण की जानकारी पहले झारखंड और पश्चिम बंगाल की महिला नक्सली नेताओं ने दी थी अब छत्तीसगढ़ के बीहड़ में भी स्वीट-प्वाइजन के नाम से कुछ लड़कियों की टीम तैयार की गई है। सियासी रूप से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले इस मुद्दे पर खुल कर फिलहाल कोई भी बोलने को तैयार नहीं लेकिन नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर सभी नेता इस बात को मानते हैं गरीब लड़कियों के देह से नक्सली लंबे समय से जबरदस्ती करते रहे हैं। स्थानीय जिला पंचायत और ग्रामीणों के स्तर पर देह शोषण का सच कई बार सामने आ चुका है। 000000000000000000000000000000000000000 फ्री सेक्स के चंगुल में आंदोलन अन्याय के प्रति खिलाफत के नाम पर अपने हिंसा को जायज ठहराने वाले नक्सलियों के कारनामें आए दिन सुर्खियों में रहते हैं। लेकिन एक सच यह भी है कि पिछले कुछ वर्षों में नक्सली क्षेत्रों से पुलिस द्वारा बरामद नक्सलियों के कागजात और कुछ पूर्व की घटनाएं यह साबित करती हैं कि नक्सल आंदोलन सेक्स के चंगुल में फंसा हुआ है। ---------------- किसान आत्महत्या के लिए हमेशा सुिखर्यों में रहने वाले विदर्भ के गडचिरौली जिले में फरवरी, 2009 में नक्सलियों को एक बहुत बड़ा हमला हुआ था। 15 पुलिसकमिर्यों को नक्सलियों ने बेरहमी से तड़पा तड़पा कर मारा था और खुद सही सलामत भागने में सफल हो गये थे। पर बाद में पुलिस ने मौके से और जंगलों की गहन तलाशी में नक्सलियों का कुछ समान बरामद किया था। भागते वक्त नक्सली बड़ी मात्रा में अपना साहित्य और दूसरा सामान छोड़ गए थे। इससे नक्सलियों से जुड़ी कुछ सनसनीखेज बातों का खुलासा हुआ। जो कागजात उसे प्राप्त हुए हैं उसमें कुछ कागजात ऐसे भी थे जो नक्सलियों के शीर्ष नेताओं द्वारा संगठन में बढ़ रहे मुक्त सेक्स चिंता को साफ बयान कर रह थे। इसका मतलब है कि नक्सली संगठन के अंदर भी इस मुक्त यौन व्यवहार को लेकर चिंता व्याप्त है। वर्ष 2011 में भी बिहार और झारखंड में आत्मसमर्पण करने वाली महिला नक्सलियों ने यह स्वीकार किया कि उनके साथ कई पुरुष नक्सलियों ने शारीरिक संबंध बनाएं। झारखंड पुलिस ने नक्सली क्षेत्रों से गर्भनिरोधक सैस पॉवर बढ़ाने वाली गोलियां, कडोम आदि भारी मात्रा में बरामद किये थे। जानकार कहते हैं कि नक्सली नीति निर्धारक अपनी लड़ाई को जनआंदोलन का व्यापक रूप देना चाहते हैं। लेकिन इसके लिए संगठन में 40 प्रतिशत महिलाओं का होना आवश्यक है। इसके लिए बड़ी संख्या में महिलाओं को जोड़ा भी गया था। प्रशिक्षण दिया गया। कई हमलों पर महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यहां तक कि गड़चिरौली के हमले में नक्सली दल का नेतत्व महिला कमांडर ने किया था। पर अफसोस हर क्षेत्र की अंदरूनी हकीकत की तरह तथाकथित जनआंदोलनों के अंदर से भी यौन कुंठाओं की हकीकत अब बाहर निकल रही है। ऐसा नहीं है कि नक्सल आंदोलन से जुड़े शीर्ष लोग इससे अनजान हैं। नक्सली नेता इस बात से चिंतित है जिसकी तस्दीक गढ़चिरौली घटना के बाद बरामद कागजातों से होती है लेकिन यह सच भी सामने आ रहा है कि नक्सल आंदोलन से जुड़कर महिलाएं पछता रही है। संगठन से मोह भंग हो रहा होगा। तभी तो नक्सली नेताओं ने कड़ी चेतावनी देते हुए पुरुष साथियों को महिलाओं से दूरी बनाये रखने की चेतावनी दी है। संयम के नये नियम बने है जिन्हें नहीं मानने पर दंड देने का भी फरमान जारी किया गया है। इस बात की संभावना से इनकार नहीं की जा सकती है कि नक्सलियों में एड्स की स्थिति गंभीर हो रही है। शीर्ष नक्सल नेता जानते हैं कि सेक्स की लोलुपता में फंस कर संगठन के सदस्य खुद को कमजोर कर रहे है। एचआईवी से ग्रस्त हो रहे है। जंगल में भागते छिपते जांच व इलाज मुिश्कल होगा। यह हकीकत बाहर जाएगी तो संगठन में 40 प्रतिशत महिलाओं को जोड़ने का लक्ष्य कभी पूरा नहीं होगा और लड़ाई कभी जनआंदोलन का रूप नहीं ले सकेगी। दिसंबर 2006 में भी यह खबर आई थी कि विदर्भ के गढ़चिरौली जिले में ही जब नक्सली शिविर पर पुलिस ने छापा मारा तो वहां कंडोम, सेक्स क्षमता बढ़ाने वाली दवाएं व अश्लील फिल्म की सीडी आदि मिली थी। करीब पांच वर्ष पहले एक और खबर आई थी। इंद्रा उर्फ पुष्पकला नाम की एक नक्सली महिला ने पुलिस के सामने समर्पण किया था। समर्पण के बाद उसने पुलिस को बताया कि उसके साथ उसके उपकमांडर ने कई बार बलात्कार किया। उसने यह भी बताया कि संगठन में हर महिला कम से कम चार-पांच नक्सलियों के हवस की भूख मिटाने की वस्तु की तरह है। इससे कई महिलाएं गंभीर यौन रोगों से पीड़ित हो जाती हैं। 24 वर्र्षीय सोनू नाम की और नक्सली ने पुलिस को समपर्ण किया और कुछ ऐसी ही कहानी बताई। उसने पुलिस को बताया कि बाली उम्र में ह ीवह नक्सली आंदोलन में शामिल हो गई। तब उसे इस बात का अंदाजा नहीं था कि यहां उसके अपने ही आबरू तार-तार करेंगे। उसे नक्सली कमांडर से प्यार हुआ। शादी की। पर उसके बुरे दिन तब शुरू हुए जब उसका नक्सली पति पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। इसके बाद दूसरे साथियों की केवल निगाहों तक नजर आने वाली यौन लोलुपता हकीकत में सामने आ गई। कई नक्सलियों ने उसके साथ हवस की भूख मिटाई। आखिर सोनू को वहां से भागना पड़ा। पुलिस को समर्पित किया। सोनू ने भी पुलिस को यही बताया था कि संगठन की हर महिला तीन-चार नक्सलियों की की हवस की शिकार होती है। कुछ वर्ष पहले पुलिस ने सुशीला नाम की एक नक्सली सिपाही को पकड़ा था। जब उसे गिरफ्तार किया गया तब वह गंभीर यौन रोग सिफलिस से पीड़ित थी। जानकार कहते हैं कि नक्सली संगठन में शामिल हर महिला की ऐसी ही दर्द भरी कहानी है। उनके मन में संगठन में आने का पछतावा है। पर क्या करें उनके लिए स्थिति सांप छूछूंदर की तरह है। पुलिस को समर्पण करती हैं तो शेष उम्र जेल में बीतने का खतरा है और संगठन में बगावत किया तो उसकी सजा जेल से ज्यादा भयावह होगी। गढ़चिरौली की घटना में पुलिसकमिर्यों को तड़पा तड़पा कर बेरहमी से मारने वाली नक्सली कमाण्डर भले ही महिला थी लेकिन न जाने कितनी महिलाएं हवस का शिकार होकर संगठन में हर दिन खुद तड़प-तड़प कर जिंदा मौत का शिकार हो रही हैं। ------------------------------------- प्रेम की सजा पहले नसबंदी तब शादी नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में जंगलों की खाक छान रहे नक्सलियों को प्रेम की भी सजा दी जाती है। नक्सली यहां प्रेम तो कर सकते हैं, लेकिन अपना घर नहीं बसा सकते हैं। कांकेर जिले में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली कमांडरों के मुताबिक शादी से पहले ही उनकी जबरदस्ती नसबंदी कर दी जाती है। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों ने नक्सली नेताओं द्वारा उनके साथ किए जा रहे दुर्व्यहार के बारे में विस्तार से बताया। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली सदस्यों पूर्व बस्तर डिविजन कमेटी के सदस्य सुनील कुमार मतलाम, उसकी पत्नी और कोर कमेटी की कमांडर जैनी उर्फ जयंती, परतापुर क्षेत्र के जन मीलिशिया कमांडर रामदास, उनकी पत्नी पानीडोबिर (कोयलीबेड़ा) एलओएस की डिप्टी कमांडर सुशीला, सीतापुर (कोयलीबेड़ा) एलओएस के कमांडर जयलाल, उसकी पत्नी सीतापुर एलओएस की सदस्या आसमानी उर्फ सनाय और रावघाट में सक्रिय प्लाटून नम्बर 25 की सदस्य सामो मंडावी ने अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि जंगल में उनके साथ आंध्रप्रदेश के नक्सली नेता बुरा बर्ताव तो करते ही है साथ ही साथ उन्हें प्रेम करने की सजा भी दी जाती है। सुनील (31 वर्ष) ने बताया कि तीन नक्सलियों ने अपनी पत्नी के साथ आत्मसमर्पण किया है तथा तीनों पुरुषों की शादी से पहले ही नसबंदी कर दी गई है। वह कांकेर जिले के आमाबेड़ा थाना क्षेत्र के फूफगांव का रहने वाला है। जब वह 17 साल का था तब नक्सली उसके गांव पहुंचे और उसे अपने साथ लेकर चले गए। नक्सलियों ने सुशील को प्रशिक्षण दिया और वह सक्रिय नक्सली सदस्य बन गया। इस दौरान वह कई वारदातों में शामिल रहा जिसमें कई पुलिसकर्मी शहीद भी हुए। सुनील ने बताया कि जब वह नक्सली सदस्य के रूप में काम कर रहा था तब उसे चेतना नाट्य मंडल की कमांडर जैनी उर्फ जयंती कुरोटी के साथ काम करने का मौका मिला। जैनी से उसकी जान पहचान हुई और बाद में यह जान पहचान प्रेम में बदल गई। जब सुनील और जैनी ने शादी कर अपना परिवार बसाना चाहा तब नक्सली नेताओं ने उसके प्रेम को स्वीकार कर लिया, लेकिन उसे घर बसाने की इजाजत नहीं दी गई। नक्सली नेताओं ने कहा कि जब सुनील नसबंदी करवा लेगा तभी उसे जैनी के साथ शादी करने की इजाजत दी जाएगी। जैनी को पाने के लिए सुनील ने ऐसा ही किया। जंगल में ही उसकी नसबंदी कर दी गई। अब सुनील मुख्यधारा में शामिल होकर अच्छी जिंदगी जीना चाहता है। वह चाहता है कि वह फिर से आपरेशन करवाए तथा अपना घर बसा सके। यही स्थिति रामदास और जयलाल की भी है। उन्हें भी प्रेम करने की इजाजत तो दी गई लेकिन जब शादी की बारी आई तब उनकी नसबंदी कर दी गई। सुनील ने बताया कि यह बर्ताव उन सभी नक्सलियों के साथ होता है जिन्हें जंगल में किसी महिला नक्सली से प्रेम हो जाता है और वह उससे शादी करना चाहता है। नक्सलियों की यहां शादी केवल नसबंदी कराने की शर्त पर ही हो पाती है। यदि कोई सदस्य इससे मना करता है तब पहले उसे खूब प्रताड़ित किया जाता है और जबरदस्ती उसकी नसबंदी कर दी जाती है। उसने बताया कि जंगल में नसबंदी करने के लिए पश्चिम बंगाल से डाक्टरों को यहां बुलाया जाता है। इस आपरेशन के बाद कई नक्सली गंभीर रूप से बीमार भी हो जाते हैं। यहां कई नक्सली ऐसे हैं जिनकी जबरदस्ती नसबंदी कर दी गई है और वे सामने आने से डरते हैं। आंदोलन खतरे में पड़ने का भय : सुनील ने बताया कि नक्सली नेताओं का मानना है कि एक बार शादी हो गई और बाल बच्चे हुए तब नक्सली सदस्य उस बच्चे के अच्छे लालन पालन के लिए घर लौट सकते हैं और उनका आंदोलन खतरे में पड़ जाएगा। इससे बचने के लिए वह पहले पुरुषों की नसबंदी कर देते हैं। पुरुषों की ही नसबंदी करने के कारणों के बारे में पूछने पर सुनील ने बताया कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों की नसबंदी आसान होती है। कांकेर के पुलिस अधीक्षक राहुल भगत का कहना है कि पुलिस का को इस बात की जानकारी लगातार मिल रही थी कि जंगल में पुरुष नक्सलियों की जबरदस्ती नसबंदी कर दी जाती है। यदि नक्सली सदस्य साधारण जिंदगी जीने और बच्चे के लिए नसबंदी हटाना चाहते हैं तब पुलिस उनकी पूरी मदद करेगी और अपने खर्च पर उनका आपरेशन करवाएगी। ------------------------------------------
पाक में नापाक हिंदू लड़कियां
पाकिस्तान में हिंदुओं के हालात बेहद खराब है। पिछले दो दिनों सैकड़ों हिंदुओं के जत्थे भारत में तीर्थयात्रा के बहाने से आए। सीमा पर उन्हें रोका गया। उनसे गीता पर शपथ दिलाई गई कि वे भारत जाकर पाकिस्तान को बदनाम नहीं करेंगे। लेकिन भारत आते ही पाक हिंदुओं ने अपने ऊपर पाकिस्तान में होने वाले जुल्मों की दस्ता सुनानी शुरू कर दी है। अब वे कह रहे हैं कि भले ही उन्हें गोली मार दी जाए, लेकिन वे भारत से वापस नहीं जाएंगे। उनका कहना है कि जिस धरती पर उनकी बहन, बेटियों को जानबूझ कर नापाक किया जा रहा है, वह रहे तो कैसे रहें?
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शादाब समी/ संजय स्वदेश
भारत के बहुसंख्यक हिंदु समुदाय पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में अल्पसंख्यक है। वहां उन्हें हिंदू होने की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। उनके साथ लूट की घटनाएं आम हैं। हिंदू व्यापारियों का उपहरण कोई आश्चर्य का विषय नहीं हैं। हर क्षेत्र में भेदभाव से पाक में रहने वाले हिंदू उब कर देश छोड़ने के लिए मजबूर हैं। कुछ तो अपनी पूरा जमीन जायदाद बेच कर किसी न किसी बहाने भारत आ कर भीड़ में गुम हो जाना चाहते हैं। भारत आने वाले हिंदुओं की दास्तां निश्चय ही दुखांत है। पिछले दिनों मीडिया में आई रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान में हिंदू महिलाओं की आबरू सुरक्षित नहीं है। इसकी पुष्टि तो पाकिस्तान की सरकारी रिपोर्ट भी करती है। वर्ष 2010 में पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने एक रिपोर्ट में कहा था कि पाक में हर महीने 25 हिंदू लड़कियों का अपहरण हो रहा है। बाली उमर में ही हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उनके साथ दुष्कर्म किया जाता है। उन्हें धर्म परिवर्तन करा कर निकाह किया जाता है और घर में नौकरों की तरह काम कराया लिया जाता है। पहले सिंध प्रांत के गोटकी जिले से आये एक परिवार ने कहा कि सबसे अधिक समस्या सिंध में है। दिन दहाडे हिंदू लड़कियों को उठा लेना और उसके साथ निकाह कर लेना आम है। पुलिस हमारी मदद नहीं करती है। रिपोर्ट करने पर ‘ईश निंदा कानून’ लगा कर ‘बंद’ करने की धमकी देते हैं।
ुइसी वर्ष मार्च में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में एक मामला गया। 19 वर्षीय रिंकल कमारी नाम की लड़की ने कोर्ट से एक दर्दनाक गुहार लगाई। रिंकल ने कोर्ट से कहा कि उसे हिंदू होने के कारण पाकिस्तान में न्याय नहीं मिल सकता है, लिहाजा उसे कोर्ट के कमरे में ही मौत दे दी जाए। सिंध प्रांत की रहने वाली रिंकल और उसके परिवार पर गांव छोड़ने दबाव था। गावं में रहने के लिए धार्मांतरण की शर्त रखी गई थी। बार-बार पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाने के बाद भी उनकी किसी ने सुध नहीं ली। यह दर्द भरी दास्ता अकेले रिंकल की नहीं है। पाकिस्तान की अनेक हिंदू युवतियों की कमोबेश कुछ ऐसी ही कहानी हैं। पाकिस्तान में केवल हिंदू लड़कियां ही प्रताड़ना की शिकार नहीं है। इसाई, सिख समुदाय की भी जवान लड़कियों का अपहरण होता है। उनकी इज्जत से खिलवाड़ की जाती है और उन पर जबरन धर्मांतरण थोपा जाता है। रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों को इस तरह से
प्रताड़ित करने वाले स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले असामाजिक तत्व वाले लोग होते हैं। गत दिनों पकिस्तान मीडिया में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक हर वर्ष करीब 300 हिंदू लड़कियों का जबरन धर्मांतरण करार कर विवाह किया जाता है। मर्जी नहीं होने पर जबरन उनकी अस्मत को तार-तार किया जाता है। पाक से भारत आने वाले हर हिंदू के मुंह से यह सुना जा सकता है कि वहां जवान बेटियों के संग रहना खतर से खाली नहीं है।
पिछले दिनों पाकिस्तान में हुए एक ताजा सर्वे में चौंकानेवाली सच्चाई सामने आई कि पाकिस्तान में 74 फीसदी हिन्दू और ईसाई लड़कियां जानबूझकर नापाक कर दी जाती हैं। पाकिस्तान की बहुसंख्यक मुस्लिम कम्युनिटी जानबूझकर उनके साथ सेक्सुअल ह्रासमेन्ट करता है। जबकि 43 फीसदी हिन्दुओं और इसाइयों का कहना है कि उनके साथ काम करने की जगह से लेकर स्कूलों तक अल्पसंख्यक होने के कारण भेदभाव किया जाता है।
पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों पर यह सर्वे एक मानवाधिकार संगठन नेशनल कमीशन फार जस्टिस एंड पीस ने किया है। इस सर्वे में पंजाब और सिन्ध के 26 जिलों को शामिल किया गया है जहां पाकिस्तान के कुल अल्पसंख्यकों का 95 फीसदी आबादी निवास करती है। पाकिस्तान के एक हजार अल्पसंख्यकों पर किए गए इस सर्वे में बताया गया है कि शैक्षणिक स्थानों पर महिलाओं के साथ जानबूझकर उत्पीड़न किया जाता है। यहां स्कूलों की जो हालत है उसमें महिलाओं के लिए इस्लामिक विषयों की पढ़ाई अनिवार्य है। महिलाओं का कहना है कि कोई और सब्जेक्ट न होने पर इस्लामिक विषयों की पढ़ाई उनकी मजबूरी है। मानवाधिकार संगठन के कार्यकारी सचिव पीटर जैकब कहते हैं कि यह सर्वे हिन्दू और ईसाई अल्पसंख्यक महिलाओं के बीच किया गया क्योंकि पाकिस्तान में यही दो बड़े अल्पसंख्यक समुदाय है. पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों में हिन्दू और इसाई 92 प्रतिशत हैं।
सर्वे में यह नतीजा सामने आया है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए कोई नीति नहीं है। उन्हें हर जगह गैरबराबरी का सामना करना पड़ता है और उनका जमकर उत्पीड़न किया जाता है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक महिलाओं में साक्षरता दर 47 प्रतिशत है जो कि राष्ट्रीय औसत से भी दस प्रतिशत कम है. पाकिस्तान में शिक्षा के अलावा जबरन धर्मांतरण और यौन शोषण अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए सबसे बड़ा संकट है। पाकिस्तान में पच्चीस लाख से पचास लाख के करीब हिन्दू बचे हैं जबकि यहां ईसाइयों की आबादी तीस लाख के करीब है। पाकिस्तान के अधिकांश अल्पसंख्यक सिंध और पंजाब क्षेत्र में रहते हैं। पाकिस्तान में औसतन हर साल 25 से 45 मामले हिंदू लड़कियों के अपहरण के दर्ज किए जाते हैं।
17 अगस्त 1974 को पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने एक भाषण के दौरान नव निर्मित पाकिस्तान के लोगों से कहा था, आप इस देश में स्वतंत्र हैं। पाकिस्तान के लिए यह बात मायने नहीं रखती है कि आप किस धर्म या जाति के हैं। आप इबादत करने के लिए मस्जिद जाएं या फिर मंदिर, आप पूरी तरह आजाद हैं। लेकिन कुछ ही सालों में खुद पाकिस्तान के लोगों ने अपने कायदे-आजम की इस बात को ताक पर रख दिया। आज 65 साल के बाद स्थिति इस मोड़ पर पहुंच चुकी है कि अल्पसंख्यक खासकर हिंदू समुदाय के लोग अपना सब-कुछ पाकिस्तान में बेचकर या छोड़कर भारत में शरण मांगने आ रहे हैं। हिंदू बाहुल्य क्षेत्र सिंध, बलूचिस्तान और पंजाब जैसे स्थानों पर स्थिति बेहद बदतर हो चुकी है। पिछले दिनों पाकिस्तान के एक निजी टीवी चैनल पर एक हिंदू लड़के द्वारा इस्लाम कबूल करने की घटना लाइव दिखाई गई। इसका पाकिस्तान के ही कई संगठनों ने विरोध किया। उनका तर्क था कि आस्था के निजी मामले को इस तरह उछालने से पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों के प्रति गलत संदेश जाएगा, और अंतत: हुआ भी यही। पाकिस्तान से कई हिंदू तीर्थयात्रा के बहाने भारत आ गए हैं और अब वापस लौटना नहीं चाहते। आने वाले दिनों में इस संख्या में और भी इजाफा होने की संभावना है।
धर्म-परिवर्तन और अपहरण
पाकिस्तान में हिंदू समुदाय के लोगों के अपहरण, धर्म परिवर्तन और लूटपाट आदि की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। वर्ष 2010 में पाक के मानवाधिकार आयोग ने एक रिपोर्ट में कहा था कि पाक में हर महीने 25 हिंदू लड़कियों का अपहरण हो रहा है।
ईशनिंदा कानून
यहां ईशनिंदा विरोधी कानून से अल्पसंख्यकों की परेशानी काफी बढ़ी है। इससे न केवल हिंदुओं, बल्कि सिखों और ईसाइयों को भी काफी दिक्कतें झेलनी पड़ी हैं। राष्टÑपति आसिफ अली जरदारी ने भी माना है कि देश में इस कानून का दुरुपयोग किया गया है। पाक के कट्टरपंथी लोगों का भारत विरोधी रवैया भी अल्पसंख्यकों के प्रति घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। भारत में होने वाली सांप्रदयिक घटना से लेकर कश्मीर मुद्दे तक का असर पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं पर होता है।
थोड़ी सी राहत
कराची में हिंदू अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। यहां के धर्मनिरपेक्ष माहौल पर कट्टरता कम हावी है। ब्रिटिश काल में स्थापित धर्मनिरपेक्ष संस्थानों में यहां के हिंदू अच्छी शिक्षा पाते हैं। खेल और सरकारी नौकरी जैसे अवसर भी यहां मौजूद हैं।
राजनीति में भूमिका कम
पाकिस्तान हिंदू पंचायत और पाकिस्तानी हिंदू वेलफेयर एसोसिएशन पाकिस्तान की मुख्य सिविल आॅर्गेनाइजेशन हैं, जो हिंदुओं से संबंधित सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों का प्रतिनिधित्व करती हैं। अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय भी धार्मिक मामलों में हिंदुओं के लिए काम करता है। सरकार ने पाकिस्तान के हिंदू बाहुल्य क्षेत्रों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र बनाया है, जहां पर उनके प्रतिनिधि खड़े होते हैं। हालांकि सक्रिय राजनीति में इनकी भूमिका बहुत कम है।
ढेरो मंदिर टूटे
1940 के दशक में हुए सांप्रदायिक दंगों में पाकिस्तानी इलाके में स्थित कई मंदिर तोड़े गए, लेकिन सरकार व समुदाय के लोगों के प्रयासों से कई अहम धार्मिक स्थल सुरक्षित बचा लिए गए। इनमें कराची का श्री स्वामीनारायण मंदिर एक प्रमुख स्थल है।
कितने अल्पसंख्यक
बांग्लादेश विभाजन से पूर्व पाकिस्तान में हिंदुओं की कुल आबादी करीब 22 फीसदी थी। बांग्लादेश विभाजन के बाद 1.7 फीसदी ही हिंदू ही पाकिस्तान में रह गए। अधिकांश अमीर घरानों के हिंदुओं ने देश छोड़ दिया है। पाकिस्तान हिंदू परिषद के अनुसार यह आंकड़ा 5.5 फीसदी है।
कभी हिंदू बहुल था सिंध
आंकड़े बताते हैं कि एक वक्त सिंध प्रांत हिंदू बहुल था, लेकिन इस समय वहां की आबादी में हिंदू केवल 17 फीसदी बचे हैं। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक इस वक्त पाकिस्तान में हिंदुओं की कुल संख्या के करीब 94 फीसदी हिंदू सिंध प्रांत में रहते हैं। पंजाब में 4.78 फीसदी, बलूचिस्तान में 1.61 फीसदी और करीब एक फीसदी हिंदू अन्य इलाकों में रहते हैं।
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