विजय सिंह।। मुंबई सुनीता अरालीकर जब सिर्फ 16 दिन की थीं, तभी उनके अनपढ़ पिता ने उनको जमीन में गाड़ दिया था। वह अपनी अंतिम सांसें गिन रही थीं, तभी ऐनवक्त पर उनके नाना मौके पर पहुंचे और सुनीता को बचा लिया। आज सुनीता जानीमानी लेखिका और समाजिक कार्यकर्ता हैं। सुनीता लातूर के आसपास के इलाकों पिछले कई सालों से कन्या शिशु हत्या के खिलाफ जबर्दस्त मुहिम चला रही हैं। 53 साल की सुनीता ने दहेज, छेड़छाड़ और जाति व्यवस्था के खिलाफ भी लोगों को जागरूक किया है।
सुनीता कहती हैं, ' मेरे जन्म के 15 दिन बाद ही मेरी मां इस दुनिया से चल बसीं। जब मैं 16 दिन की हुई तो मेरे पिता ने मुझे गांव के तलाब के पास जिंदा गाड़ दिया। दरअसल, वह मुझे जिंदा नहीं देखना चाहते थे। '
सुनीता आगे बताती हैं, 'तब लातूर बहुत ही पिछड़ा इलाका था और मेरा जन्म एक गरीब दलित परिवार में हुआ था। लेकिन मेरे नाना ने मुझे पढ़ाने का निश्चय किया और उनकी बदौलत ही मैं पढ़ाई पूरी कर पाई।'
इमर्जेंसी के वक्त जेल जा चुकीं सुनीता 2 साल पुणे के एक पब्लिशर राजन खान से मिलीं। उन्होंने सुनीता को आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद सुनीता ने अपनी आत्मकथा लिखी। बकौल सुनीता, अगर मेरी आत्मकथा से लोग प्रेरणा लेते हैं, तो यह मेरे लिए खुशी की बात होगी। 8 Mar 2011, 0938 hrs IST,टाइम्स न्यूज नेटवर्क
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